भारतीय मछुआरों की हत्या करने वाले इटली के नौसैनिकों को छोड़ेगी सरकार !

साल 2012 में इटली के नौसैनिकों के हाथों दो भारतीय मछुआरों की हत्या का मामला आख़िरी चरण में है.

अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की वजह से भारत को अपने देश में इतालवी नौसैनिकों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामला बंद करना होगा. इटली ने भारत को आश्वासन दिया है कि वो अपने देश में उनके ख़िलाफ़ आपराधिक मामला चलाएगा.

भारतीय सुप्रीम कोर्ट 15 जून को इस मामले में अपना आख़िरी फ़ैसला सुनाएगा. इससे पहले कोर्ट ने यह भी कहा था कि जब तक इटली की सरकार तय हुआ मुआवज़ा बैंक खाते में ट्रांसफ़र नहीं कर देती, भारतीय कोर्ट में केस बंद नहीं किया जाएगा.

बीते नौ साल से ज़्यादा वक़्त से चल रहे इस केस में कई उतार-चढ़ाव आए. पहले मरीन्स की भारत में गिरफ़्तारी, फिर उन्हें इटली जाने देना, इटली का उन्हें लौटाने से इनकार करना, अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में तमाम क़ानूनों के हवाले से जिरह होना और इन सबके बीच मरनेवाले भारतीय मछुआरों के घरवालों को न्याय मिलने की उम्मीद.

15 फ़रवरी 2012 को क्या हुआ था ?

15 फ़रवरी 2012 को केरल के दो मछुआरे जेलेस्टाइन और अजीश पिंकू केरल के नींदाकारा हार्बर से मछली पकड़ने निकले थे.

वो सेंट एंटनी नाव से लक्षद्वीप की ओर गहरे समंदर में मछली पकड़ने गए. लौटते समय उनका सामना सिंगापुर से मिस्र जा रहे ऑयल टैंकर एनरिका लेक्सी से हुआ.

यह इटली का जहाज़ था, जिसमें 19 भारतीयों समेत 34 क्रू सदस्य सवार थे. जहाज़ पर तैनात इटली के दो मरीन सल्वाटोर गिरोन और मसीमिलियानो लटोर ने जेलेस्टाइन और अजीश की गोली मारकर हत्या कर दी.

अपने बचाव में उन्होंने कहा था कि उन्हें नाव में सवार लोगों के समुद्री लुटेरे होने का शक हुआ था और वो प्रोटोकॉल फ़ॉलो कर रहे थे.

कुछ ही देर में इंडियन कोस्ट गार्ड को इस बारे में पता चल गया और आगे की कार्रवाई की जाने लगी.

17 फ़रवरी को भारतीय नौसेना ने इतालवी क्रू पर पाइरेसी-रोधी उपायों की धज्जियां उड़ाने का आरोप लगाया और टैंकर को कोच्चि ले आया गया.

मछुआरों की हत्या केरल के अंबलापुझा तट के पास हुई थी इसलिए 19 फ़रवरी को केरल पुलिस ने दोनों इतालवी नौसैनिकों को गिरफ़्तार कर लिया.

हालांकि, इसमें भी बहुत खींचतान हुई थी. पुलिसकर्मियों को जहाज़ पर जाकर अधिकारियों को काफ़ी कुछ समझाना पड़ा था.

उधर इटली भी अपने मरीन्स को बचाने में ज़ोर-शोर से जुट गया था. 22 फ़रवरी को इटली सरकार ने केरल हाईकोर्ट से मरीन्स के ख़िलाफ़ एफ़आईआर रद्द करने को कहा.

इतालवी सरकार ने कुछ अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का हवाला देते हुए कहा कि भारत को इस मामले में क़ानूनी कार्रवाई करने का कोई अधिकार नहीं है.

फिर 20 अप्रैल को दोनों मछुआरों के परिजनों ने केरल हाईकोर्ट बताया कि उनके और सरकार के बीच दोनों परिवारों को एक-एक करोड़ रुपए मुआवज़ा देने का समझौता हुआ है.

ये पैसा जेलेस्टाइम की विधवा पत्नी, उनके दो बच्चों और अजीश पिंकू की दो बहनों को दिया जाना था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह समझौता अवैध है और इटली भारतीय क़ानूनों के साथ खिलवाड़ कर रहा है.

2 मई को एनरिका लेक्सी जहाज़ को जाने की इजाज़त दे दी गई थी. फिर 18 मई को नींदाकारा कोस्टल पुलिस ने लटोर को प्राथमिक और गिरोन को दूसरा अभियुक्त मानते हुए केस दर्ज किया. इस प्रकरण से नाराज़ इटली ने 20 मई को अपने राजदूत को भारत से वापस बुला लिया.

जब घर जाने दिए गए इतालवी अभियुक्त

2012 के क्रिसमस से पहले इतालवी मरीन्स ने कोर्ट से त्योहार मनाने के लिए घर जाने की इजाज़त मांगी. उन्हें छह करोड़ रुपए की बैंक गारंटी और लौट आने के लिखित आश्वासन के बाद ज़मानत पर रिहा किया गया.

इस क़दम की ख़ूब आलोचना हुई थी. सवाल उठे कि क्या किसी भारतीय क़ैदी को इस तरह की रियायत दी जाती है. हालांकि, जनवरी 2013 में दोनों अभियुक्त भारत लौट आए थे.

इसके बाद फ़रवरी 2013 में दोनों अभियुक्तों ने 24 और 25 फ़रवरी को इटली में हो रहे चुनावों में वोट डालने के लिए दोबारा इटली जाने की इजाज़त मांगी. 22 फ़रवरी को उन्हें इसकी इजाज़त भी दे दी गई, पर इस बार बाज़ी पलट गई.

11 मार्च 2013 को इटली सरकार ने दोनों मरीन्स को भारत भेजने से साफ़ इनकार कर दिया. इटली ने कहा कि जब तक भारत ये आश्वासन नहीं देता कि मरीन्स के दोषी पाए जाने पर भी उन्हें मौत की सज़ा नहीं होगी, उन्हें नहीं भेजा जाएगा. उस समय हरीश साल्वे इतालवी नौसैनिकों के वकील थे.

फिर इटली के राजदूत पर गिरी गाज

इटली के रवैये से नाराज़ सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन इतालवी अंबैसडर डेनियल मन्चीनी को बिना इजाज़त भारत छोड़ने से मना कर दिया था.

वजह यह थी कि मन्चीनी ने निजी तौर पर कोर्ट को आश्वासन दिया था कि मरीन्स लौट आएंगे. हालांकि, मन्चीनी ने अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का हवाला देते हुए कहा कि उनके ख़िलाफ़ ऐसा आदेश नहीं दिया जा सकता, लेकिन गृह मंत्रालय ने सभी एयरपोर्ट्स को अलर्ट कर दिया था कि इटली के राजदूत को भारत से बाहर न जाने दिया जाए.

काफ़ी कूटनीतिक तनाव के बाद इटली सरकार के मुताबिक़ उन्हें भारत से आश्वासन मिला, जिसके बाद 22 मार्च, 2013 को ये मरीन्स भारत लौट आए.

अप्रैल में यह मामला राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) के हाथों में दे दिया था. एनआईए ने दोनों अभियुक्तों पर 'कन्वेंशन फ़ॉर दि सप्रेशन ऑफ़ अनलॉफ़ुल ऐक्ट्स अगेन्स्ट द सेफ़्टी ऑफ़ मरीटाइम नेविगेशन' (SUA) लगाया था.

यह समंदर में जहाज़ों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लाया गया प्रावधान है, जिसका मक़सद सुरक्षा को ख़तरा पैदा करनेवालों को रोकना, दंडित करना और वैश्विक आतंकवाद से निबटना है.

इस पर 10 मार्च 1988 को इटली के रोम में दस्तख़त किए गए थे और भारत इसका सदस्य है.

क्या थे दोनों देशों के दावे?

भारत का दावा था कि मछुआरों को भारतीय तट से 20.5 नॉटिकल मील दूर बिना किसी चेतावनी के मारा गया और एक्सक्लूसिव इकॉमिक ज़ोन (EEZ) के तहत ये इलाक़ा भारत के अधिकार-क्षेत्र में आता है.

केरल हाईकोर्ट ने पाया कि साल 1981 में भारत सरकार ने IPC को EEZ तक लागू कर दिया था, जिससे केरल का अधिकार-क्षेत्र सिर्फ़ 12 नॉटिकल मील तक सीमित नहीं रह गया था.

कोर्ट ने कहा कि SUA के तहत केरल का अधिकार-क्षेत्र तट से 200 नॉटिकल मील दूर तक है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने बाद में कहा था कि ये केस केरल नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के अधिकार-क्षेत्र में आता है.

वहीं, इटली का दावा था कि ये मरीन टैंकर को समुद्री लुटेरों से बचाने के लिए रखे गए थे और वो बस अपना काम कर रहे थे.

जहाज़ पर मौजूद अधिकारियों ने बयान दिए कि मरीन्स को लगा कि ये समुद्री लुटेरे हैं और उन पर गोली चलाने से पहले चेतावनी वाले फ़ायर भी किए गए थे.

इटली ने दावा किया कि ये मरीन्स भारत में 'फ़ंक्शनल इम्युनिटी' के हक़दार हैं और इन पर क़ानूनी कार्रवाई करने का अधिकार सिर्फ़ इटली को है.

दरअसल फ़ंक्शनल इम्युनिटी अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के आधार पर मिला एक अधिकार है, जिससे कोई अभियुक्त मुक़द्दमे से बच सकता है.

इटली ने दावा किया कि यह भारत के अधिकार-क्षेत्र से बाहर गहरे समंदर में जहाज़ के नैविगेशन से जुड़ा मामला है इसलिए यूनाइटेड नेशंस के लॉ ऑफ़ द सी कन्वेंशन (UNCLOS) के आर्टिकल 97 के मुताबिक़ सिर्फ़ वही देश क़ानूनी कार्रवाई कर सकता है, जिसने जहाज़ को लाइसेंस दिया हो.

इटली ने इस केस में SUA लगाने की आलोचना की थी, जो मरीन्स के उठाए गए क़दमों को एक आतंकवादी कृत्य बताता है.

7 फ़रवरी 2014 को मरीन्स के ख़िलाफ़ हत्या के आरोप को बदलकर हिंसा का आरोप कर दिया गया था. इसका मतलब था कि दोषी पाए जाने पर इन मरीन्स को मौत सी सज़ा नहीं होगी. वहीं 7 मार्च को भारत ने मरीन्स के ख़िलाफ़ SUA के आरोप हटा लिए थे.

11 अगस्त 2014 को इटली के तत्कालीन प्रधानमंत्री मैटियो रेंज़ी ने इस केस को लेकर भारत के नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की थी.

इटली की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के मुताबिक़ रेंज़ी ने मोदी से इस मामले के तेज़ और सकारात्मक हल की उम्मीद जताई थी. वहीं भारत सरकार के मुताबिक़ पीएम मोदी ने कहा था कि भारत में न्यायपालिका स्वतंत्र और निष्पक्ष है और ये मामला अदालत में विचाराधीन है.

17 सितंबर 2014 को लटोर और 28 मई 2016 को गिरोन इटली वापस लौट गए थे.

अंतरराष्ट्रीय कोर्ट की कार्रवाई

21 जुलाई 2015 को इटली ने हैमबर्ग स्थित इंटरनेशनल ट्राइब्यूनल फ़ॉर द लॉ ऑफ़ द सी (ITLOS) में अपील की.

इटली ने भारत को ये निर्देश दिए जाने का आवेदन दिया कि भारत मरीन्स के ख़िलाफ़ न्यायिक या प्रशासनिक क़दम न उठाए और गिरोन को भी इटली आने दे.

दरअसल, उस वक़्त तक लटोर इटली लौट चुके थे, लेकिन गिरोन अब भी भारत में थे. इटली ने मांग की कि ट्राइब्यूनल की कार्रवाई पूरी होने तक दोनों मरीन्स को इटली में रहने दिया जाए.

इटली ने अपनी मांग के साथ-साथ इस घटना का अपना वर्जन भी रखा था.

भारत ने इटली के पक्ष को सपाट और गुमराह करनेवाला बताया था. भारत ने ITLOS से कहा था कि हत्या के दो अभियुक्तों के ख़िलाफ़ इटली का गंभीरता से जांच न करना बताता है कि उन्हें अपनी थ्योरी पर कितना भरोसा है.

ट्राइब्यूनल ने क्या फ़ैसला दिया?

24 अगस्त 2015 को ITLOS ने दोनों देशों को निर्देश दिए कि वो अपने-अपने देशों में इस मामले से जुड़ी सभी न्यायिक कार्रवाइयां रोक दें और नए मुक़द्दमे न चलाएं, जिससे ट्राइब्यूनल की कार्रवाई पर कोई विवाद न हो.

हालांकि, ट्राइब्यूनल ने इटली के दावे को उचित भी नहीं माना था. ट्राइब्यूनल के इसी निर्देश के मद्देनज़र 26 अगस्त 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने मामले से जुड़ी कार्रवाई रोक दी थी.

जुलाई 2019 में ये केस परमानेंट कोर्ट ऑफ़ आर्बिटरेशन (PCA) के पास चला गया था.

यह हेग स्थित देशों के बीच मसले सुलझाने वाला अंतर-सरकारी संगठन है.

हेग की अदालत से क्या फ़ैसला आया?

21 मई 2020 को PCA ने आदेश दिया कि इतालवी मरीन्स पर भारत में कोई आपराधिक मुक़द्दमा नहीं चलेगा और उन पर क़ानूनी कार्रवाई इटली में होगी.

कोर्ट ने ये भी कहा कि भारत मुआवज़े का हक़दार है और भारत और इटली आपसी सहमति से मुआवज़े की राशि पर समझौता कर लें.

3-2 के नज़दीकी अंतर से PCA ने ये आदेश भी दिया कि इटली के UNCLOS का सदस्य होने के नाते इतालवी मरीन्स के पास डिप्लोमैटिक इम्युनिटी है.

इसी आधार पर PCA ने इटली के मरीन्स के ख़िलाफ़ आपराधिक जांच शुरू करने के आश्वासन को मानते हुए भारत को आदेश दिया कि वो अपने देश में इस घटना से जुड़ी सभी क़ानूनी कार्रवाइयां रोक दे.

फिर भारत सरकार ने क्या किया?

जुलाई 2020 में भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उसने PCA का आदेश मानने का फ़ैसला किया है और इसी आधार पर केस ख़त्म करने की मांग की.

यह सुनवाई तत्कालीन चीफ़ जस्टिस एसए बोबडे की बेंच कर रही थी. उन्होंने सरकार का फ़ैसला तो माना था, लेकिन ये भी कहा था कि वो पीड़ितों के परिवारों से बात किए बिना इस पर कोई फ़ैसला नहीं सुनाएंगे.

कोर्ट ने कहा कि उन्हें उचित मुआवज़ा मिलना चाहिए और अगली सुनवाई में परिवारों को भी केस में एक पार्टी बनाने का आदेश दिया.

फिर 9 अप्रैल को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि इटली सरकार पीड़ितों को 10 करोड़ रुपए का मुआवजा देने को तैयार हो गई है.

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मुआवज़े की राशि पहले विदेश मंत्रालय, फिर कोर्ट के बैंक खाते में जमा कराने को कहा. जब सरकार की ओर से पैसों का स्टेटस पूछा गया तो सरकार ने तीन दिनों में पैसा आने की बात कही थी.

हालांकि, कोर्ट ने तंज भी कसा था, "हमें पता है आप कितनी तेज़ी से काम करते हैं."

कोर्ट ने 10 करोड़ में से दोनों मृतकों के परिजन को चार-चार करोड़ और नाव के मालिक को दो करोड़ रुपये का मुआवजा देने को कहा था. कोर्ट ने कहा था कि पीड़ितों को मुआवजा मिलने के बाद ही केस बंद किया जाएगा.

11 जून की सुनवाई में जस्टिस इंदिरा बनर्जी और जस्टिस एमआर शाह की बेंच ने कहा कि वो सरकार का मुआवज़ा देने और केस बंद करने का प्रस्ताव मानते हैं और कहा कि वो 15 जून को इस पर आख़री फ़ैसला सुनाएंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि ये पैसा केरल हाईकोर्ट के खाते में जमा कराया जाए, ताकि इस बात की निगरानी की जा सके कि पैसा पीड़ितों तक पहुंचा.

कोर्ट ने मुआवज़ा पानेवालों की उम्र वगैरह की भी जानकारी ली थी, ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि उनके पैसों के साथ कुछ ग़लत न हो.

इस सुनवाई में केंद्र की ओर पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहरा, केरल सरकार और इटली सरकार के काउंसिल ने ये बातें मानीं. अब 15 जून को सुप्रीम कोर्ट में फ़ैसला सुनाया जाएगा.